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खबर सक्ती ...

एक महान विचारक, श्रेष्ठ लेखक, कुशल राजनीतिज्ञ और इन सबसे बढ़कर एक श्रेष्ठ मानव थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय ..

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25सितंबर जन्म दिवस पर रमेश सिंघानिया द्वारा विशेष लेख ..

सक्ती, पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजनीति के क्षेत्र में एक ऐसा नाम है जिसे सुनते ही श्रद्धा आकस्मिक रूप से उमड़ पड़ती है। हर प्रसिद्ध व्यक्ति महान नहीं होता और हर महान व्यक्ति प्रसिद्ध नहीं होता पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय ऐसे ही महान नेता थे जिन्हें अपने जीवन काल में वह प्रसिद्धि प्राप्त नहीं हुई जो उन्हें होनी चाहिए थी।

वृत्त पत्र में नाम छपेगा, पहनूंगा स्वागत श्रृंगार।
छोड़ चलो यह क्षुद्र भावना, हिंदू राष्ट्र के तारणहार।।

कविता की इन पंक्तियों के अनुरूप पद प्रतिष्ठा और आत्म प्रचार से दूर रहना उनका स्वभाव बन चुका था। कुछ लोग जन्म से महान होते हैं, कुछ लोग कर्म से महान होते हैं, और कुछ लोगों पर महानता लाद दी जाती है। दीनदयाल जी जन्म से नहीं कर्म से महान थे। बिलासपुर के भाजपा कार्यालय में एक कार्यक्रम में उनसे संबंधित श्रवण किया एक प्रसंग मानस पटल पर अक्सर उभर आता है। लगभग पाॅंच दशक पूर्व तात्कालिक जनसंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेई दीनदयाल जी की प्रतिमा का अनावरण करने के सिलसिले में खरसिया पधारे थे। प्रतिमा अनावरण के पश्चात जब वे उनके गले में पुष्पमाला अर्पित करने के लिए आगे बढ़े तो उन्होंने यह कह कर माला उनके चरणों में समर्पित कर दी कि मैं इस योग्य नहीं कि उनके कंठ पर यह माला अर्पित करूं। कुछ पाने की लालसा में नेताओं की उनके सम्मुख प्रशंसा करने वाले बहुत मिलते हैं परंतु किसी दिवंगत नेता के प्रति ऐसी श्रद्धा उनकी ऐसी निस्वार्थ प्रशंसा कम ही परिलक्षित होती है। दीनदयाल जी के प्रति अटल जी का यह श्रद्धा भाव दीनदयाल जी के व्यक्तित्व की महानता को ही उजागर करता है। दीनदयाल जी ने भारत की समस्याओं को उनके सही परिप्रेक्ष्य में देखा और भारत की समृद्ध संस्कृति और उसकी आत्मा के स्वरूप के अनुसार उनका हल खोजने की कोशिश की। वे राष्ट्र को प्रमुख मानते थे संस्था को नहीं। दीनदयाल जी ने आपाद्धर्म के रूप में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष पद का भार ग्रहण किया; उनके गतिशील और ओजस्वी नेतृत्व में जनसंघ में एक अद्भुत प्रवाह और शक्ति आ गई। जनसंघ के कार्यकर्ताओं पर उन्होंने कभी इस निराशावादी सोच को प्रभावी होने नहीं दिया की राजनीति गंदी होती है या क्या रखा है राजनीति में। वास्तव में यदि कोई सोच ले कि जब तक वह तैरना नहीं सीखेगा पानी में नहीं उतरेगा तो वह कभी तैरना सीख ही नहीं सकता।

राजनीति को गंदी समझकर यदि सभी सज्जन पुरुष राजनीति से दूर रहने लगे तो राजनीति हमेशा गंदी ही रहने वाली है। लगता है की कुछ ऐसा ही भाव लेकर दीनदयाल जी ने राजनीति में पदार्पण किया होगा। महत्वाकांक्षा से प्रेरित हो धन-बल का सहारा लेकर राजनीति में छा जाने की इच्छा रखने वाले बहुत मिलेंगे परंतु अभावों में पलकर अपने आचरण एवं व्यक्तित्व से राजनीति में अपना स्थान बनाना बहुत कम लोगों को आता है। उनकी कार्य कुशलता और संगठन के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण भाव को देखकर जनसंघ के संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि यदि मुझे दो दीनदयाल मिल जाऍं तो मैं देश की काया ही पलट दूंगा। सादगी, निष्ठा, त्याग दीनदयाल जी के व्यक्तित्व के अभिन्न अंग थे।
दीनदयाल जी एक महान विचारक, श्रेष्ठ लेखक, कुशल राजनीतिज्ञ और इन सबसे बढ़कर एक श्रेष्ठ मानव थे। उनका सही मूल्यांकन करने के लिए राजनीति के दायरे से बाहर आना होगा, वे केवल राजनीतिक पुरुष नहीं थे उनका चिंतन समग्र था उन्होंने समय-समय पर जो विचार व्यक्त किए हैं वे दीर्घकाल तक संपूर्ण मानवता का पथ आलोकित करते रहेंगे। उन्होंने देश को एकात्म मानववाद का दर्शन, चरैवेति का मंत्र और अंत्योदय की प्रेरणा दी। जिसकी रोशनी में हम अपने स्वयं के जीवन को सुखमय बनाते हुए संपूर्ण राष्ट्र को वैभवशाली बना सकते हैं। दीनदयाल जी का मानना था कि सृष्टि संघर्ष पर नहीं समन्वय और सहयोग पर टिकी है वह ऐसे समाज की संरचना पर जोर देते थे जिसमें वर्ग संघर्ष और वर्ग विद्वेष की कहीं कोई गुंजाइश ही न रहे वे व्यक्ति, परिवार, समाज, संसार, और प्रकृति के बीच परस्परावलंबन और सहयोग के आधार पर ऐसा सामंजस्य चाहते थे। राजनीति के अजातशत्रु की शत्रुता थी भारत विरोधी विचार धाराओं से, भारत पर आक्रमण करने वाली शक्तियों से, भारत को विभाजित करने वाली नीतियों से, राष्ट्रीय स्वाभिमान को कुंठित करने वाली चिंतन प्रणाली से। यही शक्तियां उनकी शत्रु बन गईं और यही शत्रुता उनकी हत्या का कारण। 25 सितंबर 1916 को जन्में दीनदयाल जी ने 11 फरवरी 1968 को भौतिक रूप से इस संसार को छोड़ दिया परंतु अपने विचारों के रूप में वे आज भी हमारे बीच विद्यमान हैं। आज देश में ऐसी सरकार है जिसका जन्म उनके वैचारिक आधार पर हुई है और उन्हें लागू करने में समर्थ भाव से जनता की सेवा में लगी हुई है।एक फिल्म निर्माता द्वारा उन पर बायोपिक बनाई जा रही है जिसमें उनकी मृत्यु से संबंधित रहस्य को अनावृत करने की कोशिश की जा सकती है। जन्म से नहीं कर्म से महान, मानवता के सच्चे मित्र और पुजारी महामानव दीनदयाल को मेरा शत-शत नमन!

कवि रमेश सिंघानिया ..

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