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सक्ती का जिला आबकारी कार्यालय ‘भगवान भरोसे’, न अधिकारी जवाबदेह न कर्मचारी जिम्मेदार ..

नाम बताने से इनकार, “जो करना है कर लीजिए” — आबकारी कार्यालय में बेशर्मी की हदें पार ,
48 घंटे बाद भी जिला आबकारी अधिकारी मौन, सुशासन के दावों पर खड़े हुए सवाल ..
सक्ती, प्रदेश में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में सुशासन के दो वर्ष पूरे होने के अवसर पर जहां सरकार उपलब्धियों का लेखा-जोखा जनता के सामने रख रही है, वहीं सक्ती जिले का आबकारी विभाग मुख्यमंत्री के सुशासन अभियान की खुली अवहेलना करता नजर आ रहा है। जिला कलेक्टर कार्यालय से महज दो किलोमीटर की दूरी पर संचालित जिला आबकारी कार्यालय की कार्यप्रणाली ऐसी है, मानो यह कार्यालय प्रशासन नहीं, बल्कि “भगवान भरोसे” चल रहा हो।

ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान 5 जनवरी को जब मीडिया प्रतिनिधि जिला आबकारी कार्यालय पहुंचे, तो वहां का नजारा चौंकाने वाला था। न कोई जिम्मेदार अधिकारी उपलब्ध था और न ही कर्मचारी किसी भी प्रकार की जानकारी देने को तैयार दिखे। कार्यालय में मौजूद कर्मचारियों से जब जिला आबकारी अधिकारी की उपलब्धता के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब था—“हमें नहीं पता साहब कहां हैं।” यह भी नहीं बताया गया कि अधिकारी कब आएंगे या किस कारण से अनुपस्थित हैं। इससे स्पष्ट है कि कार्यालय में सूचना तंत्र और जवाबदेही जैसी बुनियादी व्यवस्था तक नदारद है।
स्थिति तब और गंभीर हो गई, जब एक कर्मचारी से सिर्फ उसका नाम पूछने पर उसने नाम बताने से इनकार कर दिया। कर्मचारी का कहना था—“शुक्ला सर का निर्देश है कि न तो नाम बताना है और न ही किसी तरह की जानकारी देनी है। आपको जो करना है, कर लीजिए।” एक शासकीय कार्यालय में इस तरह का बयान न केवल प्रशासनिक मर्यादा का उल्लंघन है, बल्कि यह सरकारी तंत्र की कार्यसंस्कृति पर भी करारा तमाचा है।
मामले को लेकर जिला आबकारी अधिकारी नितिन शुक्ला से 5 जनवरी को फोन पर संपर्क किया गया। कार्यालय में मौजूद व्यक्ति की फोटो और पूरी जानकारी उनके व्हाट्सएप पर साझा की गई, ताकि वे स्थिति स्पष्ट कर सकें। अधिकारी ने व्यस्तता का हवाला देते हुए तत्काल कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया। हैरानी की बात यह है कि 48 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बाद, 7 जनवरी तक भी उन्होंने न तो अपना पक्ष रखा और न ही किसी तरह की सफाई दी। एक जिम्मेदार जिला स्तरीय अधिकारी का इस तरह मौन साध लेना विभागीय पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
यह भी बड़ा सवाल है कि जब जिला आबकारी कार्यालय की जमीनी हकीकत यह है, तो हर मंगलवार को कलेक्टर द्वारा आयोजित टीएल बैठकों में आखिर कैसी रिपोर्ट पेश की जाती होगी? क्या वहां भी वास्तविक स्थिति को छिपाकर केवल औपचारिकता निभाई जा रही है? यदि अधिकारी आम जनता और मीडिया के सवालों का जवाब देने में असमर्थ हैं, तो विभागीय समीक्षा और निगरानी की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
आबकारी विभाग जैसे संवेदनशील और राजस्व से जुड़े महत्वपूर्ण विभाग का यह गैर-जिम्मेदाराना रवैया न केवल प्रशासन की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि जनता के विश्वास को भी कमजोर कर रहा है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और शासन इस मामले में क्या संज्ञान लेते हैं, या फिर सक्ती का जिला आबकारी कार्यालय यूं ही सवालों से मुंह मोड़ते हुए “भगवान भरोसे” चलता रहेगा।
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