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मुख्यमंत्री का बोरे-बासी अभियान यथार्थ के कितना करीब …त्वरित टिप्पणी… अधिवक्ता चितरंजय पटेल ..

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सक्ती, कौशल प्रदेश अर्थात छत्तीसगढ़ याने मूलत: सतपुड़ा के घने जंगलों से आच्छादित वनवासियो की भूमि है, यहां पर उनके अलावा हर जाति या समाज के लोग माइग्रेटेड हैं फिर कुछ लोग जो यहांं के आदिवासी संस्कृति को जितना अधिक आत्मसात कर लिया वह उतना ही बड़ा छत्तीसगढ़िया हो गया और जो नहीं कर पाया या नहीं करना चाहता उनके छत्तीसगढ़िया होने पर समय बे समय उंगुलियां उठना स्वाभाविक है। फिर भी आज विश्लेषण का विषय है कि हम अपने अपने जाति, समाज, धर्म या राजनीतिक दल के मुखिया के आग्रह को कितनी गंभीरता से स्वीकार करते हैं या अनुकरण कर रहे हैं।

यह आज मजदूर या श्रम दिवस पर प्रदेश सरकार के मुखिया का प्रयास बोरे-बासी अभियान के अनमने ढंग से अमल करने से साफ होता दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री जी का आशय शायद यह रहा हो कि छत्तीसगढ़ के स्वर्णिम मूल संस्कृति, आचार व्यवहार व खानपान को आत्मसात कर अपने जीवनचर्या में शामिल करें पर अधिकांशत: यह आयोजन आदिवासी या श्रमिकों से परे कलेक्टरेट के ए सी सभाकक्ष या राजनीतिज्ञों के ड्राइंग रूम में चंद सिपहसलारों के साथ आज वनवासियों के लिए दुर्लभ महंगे धातु अर्थात कांसे-चांदी के बर्तनों व चम्मचों से मात्र समाचार पत्रों में फोटो छपवाने तक ही सीमित रह गया। स्थानीय समाचारों से पता चलता है कि फिलहाल सक्ती जिले में एक भी ऐसा आयोजन नहीं दिखा जहां पर समाज के तथाकथित सभ्य राजनीतिज्ञ व अधिकारी सुदूर वनवासी ग्राम में पहुंच उनके बीच मूल परंपरा को आत्मसात कर वास्तविक बोरे-बासी के बारे में जाने और उसका लाभ, महत्व समझकर अपने प्रतिदिन के जीवन चर्या मे शामिल करें। पर ऐसा न कर हमने हमारे सरकार के मुखिया को धोखा ही दिया है। फिर इस बात को लेकर परस्पर राजनीतिक बयानबाजी अथवा विवाद प्रदेश के मुखिया के साथ ही छत्तीसगढ़िया मूल संस्कृति व परंपरा का अपमान ही है। हमें याद है पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेई की भतीजी तत्कालीन भा ज पा सांसद स्वर्गीय करुणा शुक्ला जो अंतिम समय कांग्रेस में रही है के द्वारा भी छत्तीसगढ़ी संस्कृति परंपरा, पहनावा, पकवान और पहचान के लिए सतत प्रयत्नशील रहती थी उनके द्वारा भी अक्सर मुख्य मंत्री के बोरे बासी अभियान की तरह ही “सुन भैया सुन, बटकी भर बासी अऊ चुटकी भर नून” के साथ ग्रामीण अंचलों में उनके खान पान में शामिल होती रही है तभी से छत्तीसगढ़िया बासी आम लोगों के बीच चर्चा में आ चुका था जिसे प्रदेश सरकार के वर्तमान मुखिया ने छत्तीसगढ़ के इस पहचान को आम लोगों तक पहुंचाने दिली कसरत किया पर तथाकथित चंद अभिजात्य लोगों के हल्केपन से इस धरती के मूल संस्कृति परंपरा के पुनर्स्थापन के प्रयास आघात ही पहुंचा है। जैसा ये लोग अन्य सरकारी योजनाओं के साथ बरताव करते हैं। इसलिए अब तो यही कहा जा सकता है कि प्रदेश के मुखिया प्रदेश के अस्मिता और शान के साथ बदमजाक करने वालों के गुस्ताखी को अनदेखा करते हैं या इन लोगों को ऐसी नसीहत देते हैं जिससे ये लोग फिर कभी छत्तीसगढ़ महतारी के शान में गुस्ताखी करने से बाज आएं। साथ ही सभी आम छत्तीसगढ़िया से विनम्र आग्रह है कि व्यर्थ बयानबाजी बंद कर सच्चे अर्थों में इस प्रदेश की संस्कृति को आत्मसात करने के लिए मूल निवासी के पास पहुंच कर विनम्रता से बोरे-बासी की चाह रखें, ग्रहण करें तभी इस उत्सव का सही आनंद संभव है।

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