छत्तीसगढ़
धूंआ-धक्खर म घुलत हे बचपन के सपन ..

घर-परिवार, गुरुकुल अऊ समाज – सब झन के जिम्मेदारी ,
अबो नहीं जागे त आने वाला दिन अंधियार होही ..
विशेष लेख – “धुएं में उड़ता बचपन – वर्तमान समय की नई चुनौती”
(लेखक: एम.बी. बलवंत सिंह खन्ना)
बचपन – जेन ला लोग सादगी, मासूमियत अऊ अपनापन ले पहिचानथें, आज के समय म ओही बचपन एक नई समाजिक बीमारी म जकड़ात जात हे। जे मन लइका मन धरती के गोद म खेलत-खेलत, मिट्टी अऊ हरियाली म पलथें, वो मन अब धूंआ-धक्खर म अपन जिनगी के राह खोजत हवंय।
दृश्य एतका डरावना हो गे हे के 15-16 बरस के लइका, जेन ला किताब, कलम संग होय बर चाही, ओमन आज सिगरेट अऊ शराब के बोतल संग दिखथें। अब ए समस्या सिरिफ गरीब-धनी के नइ, हर वर्ग म घुस गे हे। फरक सिरिफ ए हे – अमीर घर के लइका मन एला “स्टाइल” कहिके करथें, अऊ गरीब मन “अभाव” म फँस के।
घर-परिवार, गुरुकुल अऊ समाज – सब झन के जिम्मेदारी –
शासन-प्रशासन के कमजोरी: सरकार नशा के कारोबार ऊपर कड़क कार्रवाई नइ कर पावत हे। पान दुकन म खुलेआम बीड़ी-सिगरेट बिकत हे, उहू बिना उमर पूछे। नाबालिग लइका मन तक बिना रोक-टोक ले नशा के सामान पहुँचत हे।
घर अऊ स्कूल के माहौल: आज स्कूल किताब रटावत हे, पर जीवन के सिख नइ देत। घर म माई-बाबू लइका संग बात नइ करथें, सब मोबाइल म गुम हवंय। एखर से लइका मन भटकत जात हवंय।
संगत अऊ सोशल मीडिया: आज के लइका मन यूट्यूब, इंस्टाग्राम म “कूल” बने के चक्कर म झन समझ के बुरा चीज ला अपनावत हवंय। संगत म फँस के गलत राह म चल परथें।
बिना लक्ष्य के जिनगी: जेन जिनगी म कोनो मकसद नइ, ओ जिनगी म खालीपन भराय बर नशा के सहारा लेथें। अऊ ए अब भारी पड़त जात हे।
अबो नहीं जागे त आने वाला दिन अंधियार होही –
समाज ला अब आइना देखाय के जरूरत हे। सिरिफ सरकार, स्कूल झन जिम्मेदार नइ हवंय – परिवार झन ला अब अपन जवाबदारी समझना होही।
माई-बाबू लइका संग बात करव, डांटव नइ, दिशा दिखाव।
मोबाइल देव के पहिली, लइका ला जिनगी के मतलब समझाव।
लइका मन ला सिखाव के “जेन काम माई-बाबू के सामने नइ कर सकथव, ओ काम करयच काबर?”
पहिली अइसने लायक बनव, जिहां ले तोर आदत के बोझ कोनो ला नइ सहना परय।
नशा के खिलाफ अब ठोस कदम जरूरी हे –
स्कूल म जीवन शिक्षा ला जरूरी बनाव।
नशा विरोधी अभियान सिर्फ पोस्टर म नइ, बातचीत के रूप म होव।
प्रशासन तत्काल कार्रवाई करय, जे मन नाबालिग ला नशा बेचथें।
सोशल मीडिया प्लेटफार्म म फिल्टर अऊ कड़क गाइडलाइन लागव।
माटी के सुगंध बचाय के समय हे –
छत्तीसगढ़ – हमर गांव के माटी, हमर संस्कृति, हमर अपनापन – ए सब ल बचाय बर अब एकजुट होए के जरूरत हे। जदि ए माटी म पलय वाला लइका मन नशा म डूब जाहीं, त संस्कृति कहां बचही?
अब समय हे कि समाज, स्कूल, घर अऊ शासन – सब मिलके ए धूंआ म घुलत बचपन ला एक नवा, साफ-सुथरा राह देखावं। ताकि जब कोनो लइका दिखे, ओकर हांथ म कलम होवय – सिगरेट के आग नइ।

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