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सक्ती का जिला आबकारी कार्यालय में सुशासन बेबस: न अधिकारी जवाबदेह, न कर्मचारी जिम्मेदार ..

नाम बताने से इनकार, जानकारी पर पाबंदी: सक्ती आबकारी कार्यालय में नियमों की खुले आम उड़ रही है धज्जियां ,
192 घंटे बाद भी मौन: सक्ती जिला आबकारी अधिकारी की चुप्पी पर उठे कई गंभीर सवाल ..
सक्ती, छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सुशासन और “मोदी की गारंटी” की बातों के बीच सक्ती जिले का आबकारी कार्यालय एक ऐसा उदाहरण बनकर सामने आया है, जहां शासन के दावों की खुलेआम धज्जियां उड़ती नजर आ रही हैं। यह कोई आरोप नहीं, बल्कि 5 जनवरी को की गई ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान सामने आई वह हकीकत है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
5 जनवरी को जब मीडिया प्रतिनिधि जिला आबकारी कार्यालय पहुंचे, तो वहां का दृश्य किसी भी जिम्मेदार प्रशासन के लिए शर्मनाक कहा जा सकता है। कार्यालय में न तो जिला आबकारी अधिकारी मौजूद थे और न ही कोई ऐसा कर्मचारी, जो जिम्मेदारी के साथ जानकारी देने को तैयार हो। कर्मचारियों से जब अधिकारी की उपलब्धता के बारे में पूछा गया, तो जवाब मिला—“हमें नहीं पता साहब कहां हैं।” अधिकारी कब आएंगे, क्यों अनुपस्थित हैं, इसकी जानकारी देने से भी साफ इनकार कर दिया गया।
स्थिति तब और चिंताजनक हो गई, जब कार्यालय में मौजूद एक कर्मचारी से केवल उसका नाम पूछने पर उसने नाम बताने से ही मना कर दिया। कर्मचारी का कहना था—“शुक्ला सर का निर्देश है कि न नाम बताना है और न ही किसी तरह की जानकारी देनी है, आपको जो करना है कर लीजिए।” एक शासकीय कार्यालय में इस तरह की भाषा और रवैया न केवल प्रशासनिक मर्यादा का उल्लंघन है, बल्कि यह दर्शाता है कि संबंधित अधिकारी खुद को कानून, कलेक्टर और मुख्यमंत्री से भी ऊपर समझ रहे हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए उसी दिन जिला आबकारी अधिकारी नितिन शुक्ला से फोन पर संपर्क किया गया। कार्यालय में मौजूद व्यक्ति की फोटो और पूरी जानकारी उनके व्हाट्सएप पर भेजी गई, ताकि वे स्थिति स्पष्ट कर सकें। अधिकारी ने व्यस्तता का हवाला देकर तत्काल प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया। हैरानी की बात यह है कि 192 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बाद भी, 13 जनवरी तक न तो उन्होंने अपना पक्ष रखा और न ही किसी प्रकार की सफाई देना उचित समझा। एक जिला स्तरीय जिम्मेदार अधिकारी का इस तरह मौन साध लेना विभागीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जिला आबकारी कार्यालय की जमीनी हकीकत इतनी बदहाल है, तो हर मंगलवार को कलेक्टर द्वारा आयोजित टीएल बैठकों में आखिर कैसी रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती होगी? क्या वहां भी वास्तविक स्थिति को छिपाकर केवल कागजी खानापूर्ति की जा रही है? यदि अधिकारी न जनता को जवाबदेह हैं और न ही मीडिया को, तो विभागीय निगरानी और नियंत्रण की सच्चाई अपने आप उजागर हो जाती है।
आबकारी विभाग जैसे संवेदनशील और राजस्व से जुड़े महत्वपूर्ण विभाग का यह गैर-जिम्मेदाराना रवैया न केवल शासन की छवि को धूमिल कर रहा है, बल्कि मुख्यमंत्री के सुशासन अभियान और कलेक्टर के जनदर्शन जैसे प्रयासों पर भी सवाल खड़े कर रहा है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस मामले में ठोस संज्ञान लेता है या फिर सक्ती का जिला आबकारी कार्यालय यूं ही जवाबदेही से मुंह मोड़ते हुए “भगवान भरोसे” चलता रहेगा।
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