खबर सक्ती ...
मनरेगा में लाखों की गड़बड़ी पर बड़ी कार्रवाई, तकनीकी सहायक बर्खास्त—तीन साल की चूक पर प्रशासन कटघरे में ..

कागजों में हुआ काम, जमीनी हकीकत शून्य—कार्रवाई के बाद निगरानी व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल ,
अनियमितता उजागर होते ही हड़कंप, अब अन्य जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग तेज ..
सक्ती, जिले में मनरेगा कार्यों में सामने आई लाखों रुपये की अनियमितता ने न सिर्फ सिस्टम की पोल खोल दी है, बल्कि प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कलेक्टर अमृत विकास तोपनो के निर्देशन में जिला पंचायत सीईओ वासु जैन ने सख्त कार्रवाई करते हुए जनपद पंचायत डभरा के तकनीकी सहायक संजय धीरहे की सेवा समाप्त कर दी है। यह कदम तब उठाया गया, जब जांच में यह स्पष्ट हुआ कि जिन कार्यों के नाम पर लाखों रुपये का भुगतान किया गया, वे जमीनी स्तर पर किए ही नहीं गए।
मामले की शुरुआत 7 जनवरी 2026 को एक दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित खबर से हुई, जिसमें “मनरेगा में 19.28 लाख की अनियमितता, काम शून्य, भुगतान पूरा” जैसे गंभीर आरोप सामने आए थे। खबर को संज्ञान में लेते हुए जिला प्रशासन ने तत्काल जांच के आदेश दिए। जांच के तहत ग्राम पंचायत गोबरा, जनपद पंचायत डभरा में वर्ष 2023 में स्वीकृत शाखा नहर निर्माण एवं पुनरुद्धार कार्य—छुहीपाली माइनर और सिंघरा वितरक—का भौतिक सत्यापन कराया गया।
जांच के निष्कर्ष चौंकाने वाले रहे। जिन कार्यों के लिए पूरी राशि का भुगतान हो चुका था, वे मौके पर कहीं नजर ही नहीं आए। यानी कागजों में योजनाएं पूरी दिखाकर सरकारी राशि का बंदरबांट किया गया। इसके बाद संबंधित तकनीकी सहायक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया। पहले आरोप पत्र और फिर कारण बताओ सूचना के बाद भी जब स्थिति स्पष्ट हुई, तो संजय धीरहे ने अपने जवाब में कार्य नहीं कराए जाने और गलत मूल्यांकन किए जाने की बात स्वीकार कर ली।
इस स्वीकारोक्ति के बाद प्रशासन ने इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता और पदीय दायित्वों के प्रति घोर लापरवाही मानते हुए छत्तीसगढ़ संविदा सेवा भर्ती नियम 2012 के तहत उनकी सेवा समाप्त कर दी। लेकिन इस कार्रवाई ने जितने जवाब दिए हैं, उससे कहीं अधिक सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मनरेगा जैसे संवेदनशील और बड़े बजट वाले कार्यों का नियमित भौतिक सत्यापन किया जाता है, तो इतनी बड़ी गड़बड़ी तीन वर्षों तक अधिकारियों की नजर से कैसे बची रही? क्या निरीक्षण केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह गया था? यदि समय-समय पर जांच होती रही, तो फिर जिम्मेदार अधिकारियों ने क्या देखा और क्या रिपोर्ट किया?
साप्ताहिक समय-सीमा बैठकों में भी इस तरह के मामलों की समीक्षा होती है, लेकिन वहां भी यह मामला कभी सामने नहीं आया। इससे यह स्पष्ट होता है कि निगरानी व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर खामियां हैं, या फिर जिम्मेदारों ने जानबूझकर आंखें मूंद रखी थीं।
इस कार्रवाई के बाद जिले में हड़कंप की स्थिति है और मनरेगा कार्यों की पारदर्शिता व जवाबदेही को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। अब सवाल यह है कि क्या कार्रवाई केवल एक तकनीकी सहायक तक सीमित रहेगी, या फिर उन अधिकारियों पर भी गाज गिरेगी जिनकी निगरानी में यह पूरा खेल चलता रहा?
फिलहाल प्रशासन ने सख्ती का संदेश जरूर दिया है, लेकिन असली परीक्षा अब यह है कि क्या इस मामले की परतें पूरी तरह खोली जाएंगी और सभी दोषियों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा, या फिर यह कार्रवाई भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चली जाएगी।
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