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सक्ती का जिला आबकारी कार्यालय ‘भगवान भरोसे’, न अधिकारी उपलब्ध न कर्मचारी जवाबदेह ..

नाम बताने से भी इनकार, “जो करना है कर लीजिए” — आबकारी कार्यालय में कर्मचारी का सनसनीखेज जवाब ,
24 घंटे बाद भी जिला आबकारी अधिकारी मौन, टीएल बैठकों की पारदर्शिता पर उठे सवाल ..
सक्ती, जिला कलेक्टर कार्यालय से महज दो किलोमीटर की दूरी पर संचालित जिला आबकारी विभाग का कार्यालय इन दिनों गंभीर विवादों और सवालों के घेरे में है। आम जनता और मीडिया से जुड़े लोगों का कहना है कि यह कार्यालय न तो प्रशासनिक जिम्मेदारी के साथ काम कर रहा है और न ही यहां पारदर्शिता के न्यूनतम मानकों का पालन हो रहा है। हालात ऐसे हैं कि अधिकारी तो दूर, कर्मचारी तक सीधे मुंह बात करने को तैयार नहीं हैं।
ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान जब संवाददाता 5 जनवरी को जिला आबकारी कार्यालय पहुंचे, तो वहां मौजूद कर्मचारियों का रवैया हैरान करने वाला रहा। कार्यालय में बैठे कर्मचारियों से जब जिला आबकारी अधिकारी की उपलब्धता के संबंध में पूछा गया, तो उनका जवाब था—“हमें नहीं मालूम साहब कहां हैं।” न यह बताया गया कि अधिकारी कब आएंगे, न यह कि वे कहां गए हैं। इससे यह साफ झलकता है कि कार्यालय में किसी प्रकार की सूचना प्रणाली या जवाबदेही की कोई व्यवस्था नहीं है।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब एक कर्मचारी से सिर्फ उसका नाम पूछने पर उसने नाम बताने से इनकार कर दिया। कर्मचारी ने साफ शब्दों में कहा—“शुक्ला सर ने निर्देश दिए हैं कि न तो अपना नाम बताना है और न ही किसी तरह की जानकारी देनी है। आपको जो करना है, कर लीजिए।” एक शासकीय कार्यालय में इस तरह का उत्तर न केवल प्रशासनिक मर्यादाओं का उल्लंघन है, बल्कि यह सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े करता है।

मामले में जिला आबकारी अधिकारी नितिन शुक्ला से 5 जनवरी को फोन पर संपर्क किया गया। उनसे वस्तुस्थिति जानने के लिए कार्यालय में मौजूद व्यक्ति की फोटो और पूरी जानकारी उनके व्हाट्सएप नंबर पर साझा की गई। अधिकारी ने कहा कि वे व्यस्त हैं और फिलहाल कोई जानकारी नहीं दे सकते। हैरानी की बात यह है कि 24 घंटे बीत जाने के बाद, यानी आज 6 जनवरी तक भी उन्होंने न तो अपना पक्ष रखा और न ही किसी प्रकार की प्रतिक्रिया दी। एक जिम्मेदार जिला स्तरीय अधिकारी का इस तरह सवालों से बचना विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर संदेह पैदा करता है।
यह सवाल भी उठना लाजिमी है कि जब जिला आबकारी कार्यालय इस तरह “भगवान भरोसे” संचालित हो रहा है, तो हर मंगलवार को जिला कलेक्टर द्वारा आयोजित टीएल बैठक में आखिर क्या रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती होगी? क्या वहां भी वास्तविक स्थिति छिपाकर औपचारिकता निभाई जाती है? यदि अधिकारी आम सवालों का जवाब देने में असमर्थ हैं, तो विभागीय समीक्षा की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
जिला आबकारी विभाग जैसे महत्वपूर्ण विभाग का इस तरह गैर-जिम्मेदाराना रवैया न केवल प्रशासन की छवि को धूमिल करता है, बल्कि जनता के भरोसे को भी कमजोर करता है।
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और शासन इस पूरे मामले पर क्या संज्ञान लेते हैं, या फिर यह कार्यालय इसी तरह जनता और मीडिया के सवालों से मुंह मोड़ते हुए “भगवान भरोसे” ही चलता रहेगा।
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