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राजपरिवार में शोक की लहर: राजा सुरेन्द्र बहादुर सिंह नहीं रहे, छत्तीसगढ़ की राजनीतिक और सामाजिक विरासत को अपूरणीय क्षति ..

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सक्ती की राजनीति, संस्कृति और सेवा भावना के पुरोधा नहीं रहे ,

जनता के दिलों पर राज करने वाले राजा साहब को अंतिम विदाई आज ..

सक्ती, सक्ती रियासत के अंतिम शासक और प्रख्यात जनसेवक राजा सुरेन्द्र बहादुर सिंह का आज 29 अप्रैल की शाम को निधन हो गया। वे 83 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन की खबर से पूरे सक्ती अंचल में शोक की लहर दौड़ गई है। राजा साहब का अंतिम संस्कार 30 अप्रैल बुधवार को दोपहर 12:00 राजपरिवार के पारंपरिक मुक्तिधाम, बंधवा तलाव के पास किया जाएगा। उनकी अंतिम यात्रा राजमहल से निकलकर हरि गुर्जर मठ, मां महामाया मंदिर होते हुए नगर के विभिन्न मार्गों से गुजरेगी।

एक गौरवशाली इतिहास के उत्तराधिकारी –

राजा सुरेन्द्र बहादुर सिंह का जन्म 1942 में हुआ था। वे सक्ती रियासत के उस गौरवशाली राजपरिवार से ताल्लुक रखते थे, जिसकी स्थापना ब्रिटिश काल में हुई थी। जब 1865 में छत्तीसगढ़ में 14 रियासतों का गठन हुआ, तब बस्तर सबसे बड़ी और सक्ती सबसे छोटी रियासत थी। सक्ती के पहले राजा हरि गुर्जर थे, जिनके उत्तराधिकारी रूपनारायण सिंह 1914 तक राजकाज संभालते रहे। राजवंश की परंपरा में कई उतार-चढ़ाव आए, और अंततः 1960 में, राजा लीलाधर सिंह की मृत्यु के पश्चात, मात्र 18 वर्ष की आयु में सुरेन्द्र बहादुर सिंह ने सक्ती रियासत की गद्दी संभाली।

राजनीति में भी निभाई विशिष्ट भूमिका –

राजा सुरेन्द्र बहादुर सिंह न केवल एक पारंपरिक शासक रहे, बल्कि उन्होंने स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में भी सक्रिय भागीदारी निभाई। वे कई बार विधायक चुने गए और तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री पद को सुशोभित किया। जांजगीर जिले की स्थापना में उनका योगदान अविस्मरणीय रहा। वे छत्तीसगढ़ और राष्ट्रीय राजनीति दोनों में एक सशक्त हस्ताक्षर के रूप में पहचान बनाए रखे। उनका कद इतना प्रभावशाली था कि क्षेत्र के वरिष्ठ नेताओं, जैसे स्व. वेदराम व स्व. भवानीलाल वर्मा, के मंत्री रहते हुए भी वे विधायक पद पर रहकर अधिक प्रभावशाली सिद्ध होते थे।

सक्ती की जनता का प्रिय नेता –

राजा सुरेन्द्र बहादुर सिंह ने जनता के दिलों में अपने व्यवहार, सेवाभाव और दूरदर्शी नेतृत्व के कारण विशेष स्थान बना लिया था। वे न केवल शासन के लिए बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी सक्ती अंचल की पहचान बन गए थे। विपक्षी दलों में भी उनके प्रति आदर का भाव था। उनके जीवन में ही नहीं, उनके पश्चात भी जनता ने हमेशा उनकी राजनीतिक अनुपस्थिति को महसूस किया।

एक युग का अंत –

राजा साहब के निधन से सक्ती अंचल ही नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ को एक अपूरणीय क्षति हुई है। उनका जीवन सादगी, सेवा और संकल्प का प्रतीक था। सक्ती अंचल मर्माहत है और इस नेतृत्व की भरपाई सहजता से संभव नहीं है।

ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को चिरशांति प्रदान करें। राजपरिवार व सक्ती की जनता को इस कठिन समय में धैर्य व संबल मिले।

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